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Rani Avanti Bai Biography in Hindi

Rani Avanti Bai Biography in Hindi

भारतीय इतिहास में एक से बढकर एक वीरांगनाएं पैदा हुईं हैं। उन्हीं में से एक प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना अवंतीबाई लोधी है। इन्होंने सन 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया था लेकिन भारतीय इतिहासकारों  ने हमेशा से उन्हे नजर अंदाज किया है।

देश में सरकारों  या  प्रमुख सामाजिक संघटनों द्वारा स्वतन्त्रता संग्राम से जुड़े लोगों के जो कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं वो सिर्फ और सिर्फ कुछ प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानियों के ही होते हैं लेकिन बहुत से ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी है

जिनके अहम योगदान को न तो सरकारें  याद करती है और न ही समाज याद करता है लेकिन उनका योगदान भी देश के अग्रणी  श्रेणी में गिने जाने वाले स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों से कम नहीं है।

ऐसे ही 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता  संग्राम की एक महान वीरांगना  अवंतीबाई लोधी है।इनके अतुलनीय योगदान को हमेशा से ही इतिहासकारों ने कोई अहम स्थान न देकर  नाइंसाफी की है।

लेकिन इनका योगदान भी 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की अग्रणी नेता वीरांगना  झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई से कम नहीं है लेकिन इतिहासकारों की पिछड़ा और दलित विरोधी मानसिकता  ने हमेशा से ही इनके त्याग ,बलिदान और स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान को नजरअंदाज किया है।

वीरांगना अवंतीबाई लोधी  आज भी लोक काव्यों  की  नायिका  के रूप में  हमें राष्ट्र के निर्माण ,शौर्य,बलिदान व  देशभक्ति की प्रेरणा प्रदान कर रहीं है।

Rani Avanti Bai Biography in Hindi

Rani Avanti bai Biography in Hindi

जन्म-:

रानी अवंतीबाई लोधी का जन्म 16 अगस्त 1831 को मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के मनकेहदी  नामक गाँव मे राजा रावजुझार सिंह के घर पर हुआ था।

बचपन-: 

वीरांगना अवंतीबाई लोधी ने बचपन में ही घुड़सवारी ,तलवारबाजी और बन्दूक से निशाना लगाना सीख लिया था। छोटी सी उम्र में इस बच्ची की घुडसवारी  को देखकर लोग हैरान हो जाते थे।रानी अवंतीबाई लोधी बचपन से ही वीर और साहसी बालिका थी।

शिक्षा-:

रानी  अवंतीबाई लोधी की शिक्षा मनकेहदी गांव में ही सम्पन्न हुई।

विवाह-:

रानी अवंतीबाई लोधी का विवाह रामगढ़ के राजा विक्रमजीत के साथ हुआ। राजा विक्रमजीत बहुत ही योग्य और कुशल शासक थे।उनकी धार्मिक कार्यों में अधिक रुचि थी इसलिए वो राजकीय कार्यों पर कम ध्यान देते थे।

इनके दो पुत्र थे शेरसिंह और अमानसिंह। छोटी सी ही उम्र में इनके पिता का देहांत हो गया और राज्य का सारा कार्यभार  रानी अवंतीबाई लोधी के कंधों पर आ गया।

अंगेजों की राज्य हड़प नीति-:

भारत देश मे उस समय पर लार्ड डलहौजी ब्रिटिश शासन का गवर्नर जनरल था। लार्ड डलहौजी का प्रशासन  चलाने का तरीका साम्राज्यवाद से प्रेरित था।भारत में लार्ड डलहौजी राज्य   हड़प नीति के वजह से पूरे देश में  हा हा कार मच हुआ था।।लार्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अंतर्गत जिस राज्य का कोई बालिग उत्तराधिकारी नहीं होता था तो ब्रिटिस सरकार उसे अपने साम्राज्य में  विलय कर लेती थी।

जिन राजाओं की कोई बालिग  संतान  नहीं होती तो वे ब्रिटिश सरकार की अनुमति के  बिना  किसी के पुत्र को गोद नहीं ले सकते।ऐसा ब्रिटिश सरकार का नियम था।इस  ब्रिटिश सरकार के गलत नियमों का भारत के राजाओं ने विरोध किया और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह  छेड़  दिया ।

जब ब्रिटिश शासन को पता चला कि रामगढ़ के राजा विक्रमजीत की म्रत्यु हो चुकी  है और उनका कोई बालिग उत्तराधिकारी नहीं है तो उन्होंने रामगढ़ को  ब्रिटिश शासन में मिलाने के लिए रानी रानी अवंतीबाई लोधी को पत्र लिखा कि वह अपने राज्य को ब्रिटिश शासन के सुपुर्द कर दे।

संघर्ष-:

रानी अवंतीबाई लोधी ने अपने आस पास के छोटे छोटे राजाओं  को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित होने के लिए संदेश भेजा। देश के सभी राजाओं ने रानी अवंतीबाई लोधी  के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के विरूद्ध युद्ध लड़ने का निश्चय किया।

रानी ने अपने सैनिकों को अच्छी तरह से युद्ध लड़ने के लिए प्रशक्षित किया और अपने किले मरम्मत कराकर उसको और मजबूत और सुदृढ़ बनाया।मध्य भारत के सभी राजा रानी अवंतीबाई के नेतृत्व में संगठित होने लगे ।

रानी अवंतीबाई लोधी के मजबूत नेतृत्व  से  ब्रिटिश शासन को चिंता होने लगी। रानी अवंतीबाई लोधी ने अपने राज्य रामगढ़ में ब्रिटिश शासन के अधिकारों को मानने से इनकार कर दिया तो ब्रिटिश शासन ने रामगढ़ पर आक्रमण करने का निश्चय किया।

ब्रिटिश सेना और रानी की क्रांतिकारी से कई बार युद्ध हुआ और रानी ने युद्ध मे ब्रिटिश सेना को परास्त ।कुछ  दिनों बाद ब्रिटिश सेना ने रामगढ़ पर फिर से हमला बोल  दिया तो  रानी  ने भीषण युद्ध करते हुए ब्रिटिश सेना को फिर से परास्त कर दिया।

अंग्रेजों ने अपने इस अपमान का बदला  लेने के लिए रानी अवंतीबाई लोधी के खिलाफ  एक विशाल सेना लेकर युद्ध करने का निश्चय किया। आखिरकार अंग्रेजों की विशाल सेना ने रामगढ़ को चारों ओर से घेर कर घनघोर युद्ध शुरू कर दिया ।

इस युद्ध मे रानी के  काफी सैनिक मारे गए  क्योंकि रानी की सेना अंग्रेजों की सेना के मुकाबले में काफी कम थी ।रानी ने फिर भी भयंकर युद्ध किया।अंत नें ब्रिटिश सेना  ने रामगढ़  में भीषण मारकाट और लूटपाट  मचा दी और रामगढ़ पर कब्जा कर लिया तो रानी ने अपनी बची हुई सेना को लेकर पहाड़ों की तरफ जाने का निश्चय किया।

अंग्रेजों की विशाल सेना रानी अवंतीबाई को खोजते खोजते पहाड़ों की तरफ़ पहुंची और रानी को आत्म समर्पण करने को कहा लेकिन रानी ने आत्म समर्पण करने से इनकार कर दिया तो अंग्रेजी सेना ने रानी को चारों तरफ से घेर लिया और एक भयानक युद्ध शुरू हो गया ।

इस युद्ध मे रानी के सभी सैनिक मारे गये ।अंत मे रानी ने खुद को चारों तरफ से घिरा हुआ देखकर अपने  शीने में तलवार भोंक दी।इस तरह सन 1858 को रानी वीरगती को प्राप्त हुई। 

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