Rani Laxmibai Biography in Hindi

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भारत देश में वैसे तो कई वीरांगना पैदा हुईं हैं।लेकिन उनमे से एक झाँसी की रानी एक महान वीरांगना है।जिसके शौर्य और साहस की प्रसंशा हर जगह पर होती है । विशेषतः उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में झाँसी की रानी की गाथाएँ हर जगह पर आज भी गायीं जाती हैं।जैसे…..

बुन्देले और हरबोलों के मुंह से हमने सुनी कहानी थी।खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

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जन्म-:

महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवम्बर 1828 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में हुआ था । इनके पिता का नाम मोरोपन्त तांबे औऱ माता का नाम भगीरथी बाई था।

इनकी माता गृहणी और धर्मिक स्वभाव की थी। इनके पिता एक मराठी थे औऱ मराठा बाजीराव की सेवा में थे। महारानी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मनु था । मनु बचपन से ही बहुत सुंदर थी इसलिये प्यार से लोग उन्हें छबीली कहकर पुकारते थे।

बचपन-:

4वर्ष की अवस्था मे ही इनकी माता का देहांत हो गया था। पत्नी की मृत्यु हो जाने के कारण  पिता मोरोपन्त बहुत दुखी हुए और उन्हे चिंता सताने लगी कि अब उनकी नन्ही सी बच्ची की देखभाल कोंन करेगा।

काफी सोचने के बाद मोरोपन्त मनु को साथ लेकर  बाजीराव पेशवा के पास चले गए ।मनु बहुत ही सुंदर और सुशील कन्या थी। बाजीराव पेशवा उसे बहुत प्यार करते थे।बाजीराव पेशवा के भी दो पत्र थे। ये तीनों बच्चे बहुत ही प्यार से मिलझुल कर खेलते थे।

शिक्षा-:

बाजीराव पेशवा ने अपने पुत्रों को घुड़सवारी सिखाने का प्रबंध किया ।मनु भी उनके साथ घुड़सवारी का अभ्यास करती रही और थोड़े ही दिनों में एक अच्छी घुडसवार बन गयी। मनु ने हथियार चलाना भला बरछा फ़ेंकना और बंदूक से निशाना लगाना भी सीख लिया।

विवाह-:

मनु का विवाह झांसी की राजा गंगाधर राव के साथ हुआ। कुछ समय व्यतीत हो जाने के बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया ।रानी लक्ष्मीबाई और राजा गंगाधर राव बहुत प्रसन्न हुए।

बालक तीन महीने का नही हुआ कि बीमारी के कारण उसकी म्रत्यु हो गयी।राजा गंगाधर राव इस सदमे को सह नही सके और बीमार पड़ गए।फ़िर उन्होने राजदरबारियों से सलाह मशविरा करके  एक दत्तक पत्र को गोद लिया और उसका नाम दामोदर राव रखा।

म्रत्यु-:

21 नवंबर 1853 को राजा गंगाधर राव की म्रत्यु हो गई।रानी पुत्र शोक के कारण पहले से ही दुखी थी पति की म्रत्यु हो जाने के कारण रानी का दुख और  बढ़ गया।

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संघर्ष-:

सन 1857 में देश भर में अंग्रेजो के ख़िलाफ़ जगह-2 पर विद्रोह हो रहे थे। धीरे धीरे ये विद्रोह झांसी तक भी पहुंच गया। झांसी के विद्रोही संगठनों ने कुछ अंग्रेज अफसरों को मार डाला।

बचे हुए अंग्रेजों ने खुद को सुरक्षित रखने के लिए रानी के राज महल में शरण लेली लेकिन ये आजादी की लड़ाई का विद्रोह अंग्रेजो के विरूद्ध पुरे शहर में फेल चुका था तो कुछ विद्रोहियों रानी के राजमहल में शरण लिए हुये अंग्रेजों को मार डाला ।

इसके बाद अंग्रेजों के मन मे यह बात बैठ गयी कि रानी लक्ष्मीबाई विद्रोही संगठनों से मिली हुए है तो अंग्रेजों ने एक विशाल सेना लेकर झांसी पर आक्रमण कर दिया।

अंग्रेजों के इस अचानक आक्रमण  से रानी घबराई नहीं और वीरता पूर्वक युद्ध किया।अंत में अंग्रेजों की सेना झांसी में घुस गई उसने लूटपाट और मारकाट  मचा दी।

झांसी की रानी ने कई दिनों तक वीरतापूर्वक युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुई।इसप्रकार वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए 1857 मैं अपने प्राणों की बलि देदी। ऐसी वीर वीरांगनाओं से देश का मस्तक हमेशा ऊंचा बना रहेगा।

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